Tuesday, January 24, 2012

Song of Us


A tribute to college days - a song which we prepared in  in IIT- Song of US
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इक कोशिश , आशा है
जी लेंगे जीभर के हम

नही महज यह गीत जो हम गुनगुना रहे
मिल गये हैं संग वो जो वो दिल हैं गा रहे
ये साथ ना छोड़ेंगे हम
आए भले कितने सितम

सपनो में देखा है जैसा
हो अपना जहाँ एक वैसा
जी लें जीभर इस जीवन को
सोचा है हमने ऐसा
थामे रहें ये हाथ हम
आए भले कितने सितम

दिन शायद ऐसे भी आयें
खुद को टूटा हुआ पाए
याद करेंगे शायद जो यह पल
आँखे नाम हो जाए
याद रहे अपनी कसम
थे साथ हैं, रहेंगे हम

Wednesday, January 18, 2012

बेतमन्ना

तुमसे मिलना है, ए ज़िंदगी
ज़रा फ़ुर्सत तो पहचानो
कभी इस बेतमन्ना की
तमन्ना को भी तो जानो

तुम्हे सोचा किया करना
तुम्हारी राह यूँ तकना
तुम्हे ही ढूँढते रहना
हमारा काम है अब तो

की हम अब हैं ही तुमसे बस
ना हमको यूँ जुदा मानो

Monday, January 16, 2012

कोई इक दिन हज़ारो में

कोई इक दिन हज़ारो में
बना जाता है बंजारा
भटकते चौक चौबारे
मंदिर, चर्च गुरद्वारा

कोई इक दिन हज़ारो में
बना जाता है नाकारा
ना कोई "टू डू लिस्ट"
नाही मैं काम का मारा

कोई इक दिन हज़ारो में
बना जाता है शायर भी
की यादें उनकी आती हैं
बनाती दिल को आवारा

आज ना जाने क्या हुआ
ये तीनो मिल गये हैं दिन
बना छोड़ा है मुझको इक
शायर बंजारा , नाकारा

Saturday, January 14, 2012

जिन दीनो

जिन दीनो कोई नही था
इन यादों के गाँव में
अकेला ही शीतल होता था
यहाँ की ठंडी छाँव में

खालीपन तो था कुछ किंतु
खुश तो उसमें भी था मैं
आकर तुमने साथ दिया तो
कहाँ रहा फिर तन्हा मैं

उस पल सचेत किया दिमाग़ ने
शायद आदत से हो मजबूर
की पास आकर चले गये तो
क्या होगा, इक दिन तुम दूर

दुनिया देख रखी थी उसनें
दिन के बाद रात देखी थी
लिफाफो में बंद होते उसने
यादो की बारात देखी थी

Sunday, January 8, 2012

कहाँ गए


साज़ यहाँ, आवाज़ यहाँ
पर सुनने वाले कहाँ गए
दिल रह रह कर पूछ रहा
हमें पूछने वाले कहाँ गए

जो याद कभी कर लेते थे
वो भूलनेवाले कहाँ गए
संग संग ख्वाबो के झूलो में
वो झूलनेवाले कहाँ गए

सपनो की साथ वो चादर
झीनी बुननेवाले कहाँ गए
आकाश में अंतिम यादों के
वो उड़नेवाले कहाँ गए

दिल रह रह कर पूछ रहा
हमें पूछने वाले कहाँ गए

दिल की बातें


दिल की बातें जाने दो
क्या देना पागल को तूल
सरलता से बाकी बातों को
जैसे जाते हो, जाओ भूल

Tuesday, December 13, 2011

फिर इक आज


फिर इक आज इशारा करो
इन आँखो के किनारों से
बड़े हफ़्तो के बाद महीनो ने
आज तुमसे मिलवाया है

फिर इक आज कहानी कहो
इस मेहमान कागज पर
हवा का ज़ोर ना जाने
इसे किस जानिब से लाया है


फिर इक आज तमन्ना बतलाओ
वो जो पूरी नही होती
मुद्दतो बाद मय्कदे में
वो साक़ी लौट आया है

बहुत अच्छे लग रहे थे


कल बहुत अच्छे लग रहे थे तुम
केमिस्ट्री ट्यूशन की क्लास में
वो हल्की नीली सलवार सूट
काफ़ी फॅब रही थी तुमपे
लग रहा था पूरी क्लास में जैसे
एक नीलम उजाला छाया हो

मैं भी उसी क्लास में आता हूँ
तुम्हे पता नही चलता होगा
तुम्हारी और मेरी बेंच के बीच
चार बेंचो का फासला है

जब मास्टर ने तुमको डाटा था
इक प्रश्न का ग़लत हल बताने पर
उसको बहुत ही गालिया दी थी मैने
मन ही मन.
और सोचा की सारे के सारे सवाल
तुम्हे पहले से ही समझा दूँ


तुम्हे निहार रहे थे कुछ छात्र
मन किया उन्हेभी धमका दूँ
पढ़ने आते है या बदमाशी करने

पर फिर लगा उनकी क्या ग़लती
तुम सच में
बहुत अच्छे लग रहे थे कल.

Saturday, December 10, 2011

जब सोचता हूँ


आगे की जब सोचता हूँ
पीछे सब गुम हो जाता है
क्या छुपा है काल की गर्त में
सब मालूम हो जाता है.

भविष्य को देखकर चलने का
जब कभी जुनून हो जाता है
हर कदम घावों पर रखना
इक क़ानून हो जाता है.

जिंदा जो में इस शरीर को
किसी तरह रख लेता हूँ
अंजाने मेरे हाथो इस
मन का खून हो जाता है.

Tuesday, December 6, 2011

फ़क़ीरत


चले चलना , वहाँ तक
जहाँ पर वक़्त रुक जाए
की ढल जाना
हमारी नही सूरज की फ़ितरत है
उजाले में वो होंगे और
जो राहें ढूँढा करते हैं
हमें तो अंधेरो में ए दोस्त
सफ़र करने की आदत है

ज़मीं गर ख़त्म हो जाए
मॅंगा लेना फलक थोड़ा
सुना है दरमयान इनके
बहुत ही गहरी क़ुरबत है
गर मंज़िल तुमको मिल जाए
उसे भी साथ ले चलना
उसको भी तो दिखला दें
की कहते किसको फ़क़ीरत हैं