Tuesday, December 13, 2011

फिर इक आज


फिर इक आज इशारा करो
इन आँखो के किनारों से
बड़े हफ़्तो के बाद महीनो ने
आज तुमसे मिलवाया है

फिर इक आज कहानी कहो
इस मेहमान कागज पर
हवा का ज़ोर ना जाने
इसे किस जानिब से लाया है


फिर इक आज तमन्ना बतलाओ
वो जो पूरी नही होती
मुद्दतो बाद मय्कदे में
वो साक़ी लौट आया है

बहुत अच्छे लग रहे थे


कल बहुत अच्छे लग रहे थे तुम
केमिस्ट्री ट्यूशन की क्लास में
वो हल्की नीली सलवार सूट
काफ़ी फॅब रही थी तुमपे
लग रहा था पूरी क्लास में जैसे
एक नीलम उजाला छाया हो

मैं भी उसी क्लास में आता हूँ
तुम्हे पता नही चलता होगा
तुम्हारी और मेरी बेंच के बीच
चार बेंचो का फासला है

जब मास्टर ने तुमको डाटा था
इक प्रश्न का ग़लत हल बताने पर
उसको बहुत ही गालिया दी थी मैने
मन ही मन.
और सोचा की सारे के सारे सवाल
तुम्हे पहले से ही समझा दूँ


तुम्हे निहार रहे थे कुछ छात्र
मन किया उन्हेभी धमका दूँ
पढ़ने आते है या बदमाशी करने

पर फिर लगा उनकी क्या ग़लती
तुम सच में
बहुत अच्छे लग रहे थे कल.

Saturday, December 10, 2011

जब सोचता हूँ


आगे की जब सोचता हूँ
पीछे सब गुम हो जाता है
क्या छुपा है काल की गर्त में
सब मालूम हो जाता है.

भविष्य को देखकर चलने का
जब कभी जुनून हो जाता है
हर कदम घावों पर रखना
इक क़ानून हो जाता है.

जिंदा जो में इस शरीर को
किसी तरह रख लेता हूँ
अंजाने मेरे हाथो इस
मन का खून हो जाता है.

Tuesday, December 6, 2011

फ़क़ीरत


चले चलना , वहाँ तक
जहाँ पर वक़्त रुक जाए
की ढल जाना
हमारी नही सूरज की फ़ितरत है
उजाले में वो होंगे और
जो राहें ढूँढा करते हैं
हमें तो अंधेरो में ए दोस्त
सफ़र करने की आदत है

ज़मीं गर ख़त्म हो जाए
मॅंगा लेना फलक थोड़ा
सुना है दरमयान इनके
बहुत ही गहरी क़ुरबत है
गर मंज़िल तुमको मिल जाए
उसे भी साथ ले चलना
उसको भी तो दिखला दें
की कहते किसको फ़क़ीरत हैं

निद्रा डूब गयी बेचारी


निद्रा डूब गयी
रात्रि के तालाब में
गोता मारना चाह रही थी.
बेचारी
क्या पता था उसे
स्वप्नो के इस ताने बाने को
बाँधा ही गया है उसके लिए
अचेतावस्था का अभिमान मानना
जानना चाह रही थी
डूब गयी.

Sunday, December 4, 2011

तीन पैरो की टेबल


घर शिफ्टिंग के दौरान, सामान पैक करते करते
अनायास ही दिख गयी वो
थोड़ी नाराज़ सी है मुझसे
कई दिनोसे रूठी रूठी जान पड़ती थी
या फिर बीमारी की वजह से
थोड़ी चिड़चडी हो गयी है


दो साल पहले जब नई नई आई थी घर में
काफ़ी घुल मिल गये थे हम दोनो
कितनी ही कविताएँ लिखी मैंने उस पे
और कितने ही चाय के कप 
ग़लती से उसपे गिरा दिए
पर कभी बुरा नही माना उसने


एक दिन उसका एक स्क्रू ढीला होकर
पता नही कहाँ गिर गया
बीमारी दिन ब दिन बढ़ती गई
फिर एक दिन उसका एक पैर घायल हो गया
उस दिन से काम वाली दीदी ने 
उसे एक कोने में रख दिया था फोल्ड करके


आज जब घर का सामान पॅक हो रहा है
शायद चाहती है की उसे भी साथ ले जाऊं
इसीलिए नाराज़ है शायद मेरी,तीन पैरो की टेबल

Friday, December 2, 2011

याद आ गये


याद आ गये तुम दोस्त
मूक मेरे अभिप्रायो को
बधिर इन उपायो को
मेरे इस अंतर के सच को
याद आ गये!

आ क्या गये, बस मिटा ही गये
इस नाखुशी को, जो अब तक खुशी मानी
हर उस कमी को , जो हमने पूरी जानी
आईना तोड़ दिया मिथ्या का
की बस
रुला ही गये तुम दोस्त
याद आ गये!

गर तुम दूर जाते, तो वापस भी लता
अगर रूठ जाते , तुम्हे मैं मानता
है शिकवा बस इतना ही तुमसे
की बस भुला ही गये तुम दोस्त
याद आ गये!

तुमसे

हर दिन की शुरुआत होती है तुमसे
या बात से, या ख्याल से
या फिर दिल में उठते सवाल से
की तुम कैसी हो?

दिन ऐसे भी थे,
जिनकी शुरुआत का पता ही न चला 
ना ही बात से, ना ख्याल से,
ना ही अचनकी इक सवाल से
ना ही बंधन था, ना कोई गिला
ना ही प्यार, ना उसका सिला
तन्हाई सी इक ज़रूर थी
मेरी सुबहो में दुबकीहुई

दिन ऐसे भी थे ,
जो बस शुरू हुए
उन्हे वापिस जाते देखा नही
शायद दुनियादारी में उलझा रहा हुंगा
उस समय बिल्कुल समय नही था
बात का ना ख्याल का
जवाब का ना सवाल का
बस इक दौड़ थी और मैं प्रतिभागी
कुछ ऐसी भी थी जिंदगी.

आज,ये जो बात है  जो ख्याल है
ये जवाब और येसवाल है
मेरी सोच के हैं हम कदम
मेरी सुबहें इनसे बिलाल हैं 

तुम देखे देखे से लगते हो


नातो के , जो छूट गए हैं
धागे,
गाँठे ढूँढ रहे हैं
कहते हैं मुझसे
"तुम देखे देखे से लगते हो"
वादे जो मुझसे किए थे
लगता है वो भूल रहे हैं.

निभाना , बिन जताए
हँसाना, बिन रुलाए
शायद अब उन्हे पसंद नही.
की आज वो दोस्ती को
शर्तो में बाँधने के
बहाने ढूँढ रहे हैं.

पल

पल ,
निकल गया यह भी हाथ से
लड़ाई चलती ही रही
दुनियादारी की ज़ज्बात से
समय गर दे सकता गवाही
तो गवाह हर घड़ी होती
कोई भी तो नही गुजरा यहा से
जाग रहा हूँ मैं रात से
तोड़ पल की बेड़ियो को
पहुच पाऊँ किसी निष्कर्ष पर
चाहता हूँ मैं भी किंतु
विवश हूँ हालत से
जज्बातो की दुनिया अलग है
दुनिया के ज़ज्बात अलग
कितना कहूँ , कहता रहूं?
कोई तो बात निकले बात से