Tuesday, December 13, 2011

फिर इक आज


फिर इक आज इशारा करो
इन आँखो के किनारों से
बड़े हफ़्तो के बाद महीनो ने
आज तुमसे मिलवाया है

फिर इक आज कहानी कहो
इस मेहमान कागज पर
हवा का ज़ोर ना जाने
इसे किस जानिब से लाया है


फिर इक आज तमन्ना बतलाओ
वो जो पूरी नही होती
मुद्दतो बाद मय्कदे में
वो साक़ी लौट आया है

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