कभी जो आम था पंछी , बनेगा ख़ास वो इक दिन
की बेआवाज़ था जो कल, करेगा आवाज़ वो इक दिन
ये कैसा खेल पसरा ख़ासियत और आमदारी का
कि नख कटवा लिए उसने, वो भी बाज़ था इक दिन.
की बेआवाज़ था जो कल, करेगा आवाज़ वो इक दिन
ये कैसा खेल पसरा ख़ासियत और आमदारी का
कि नख कटवा लिए उसने, वो भी बाज़ था इक दिन.
No comments:
Post a Comment