Tuesday, December 6, 2011

फ़क़ीरत


चले चलना , वहाँ तक
जहाँ पर वक़्त रुक जाए
की ढल जाना
हमारी नही सूरज की फ़ितरत है
उजाले में वो होंगे और
जो राहें ढूँढा करते हैं
हमें तो अंधेरो में ए दोस्त
सफ़र करने की आदत है

ज़मीं गर ख़त्म हो जाए
मॅंगा लेना फलक थोड़ा
सुना है दरमयान इनके
बहुत ही गहरी क़ुरबत है
गर मंज़िल तुमको मिल जाए
उसे भी साथ ले चलना
उसको भी तो दिखला दें
की कहते किसको फ़क़ीरत हैं

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