Friday, January 17, 2014

Poem from Praddy on our Wedding

Nana, nani, bachhon aur fachhon,
Mummy, papa, aur poo ki behnon!
Mere batch k haraami bhai,
Yent ra, Salaam, Nomoshkaar aur Hi!

Sab ko ek khabar hai sunaai -
Archade se baaraat Pentacos hai aayi!!

Intro ke baad sangeet hai, karna sab ko choreo hai.
Muhrat ka naam Night-out hai, phere saat 2.2 ke hain!

Jab Prof ki nai sune, to pundit ki kya sunenge,
Butter paper ke peeche to nazre churaaye jayenge.

Topo table pe mehendi trace hogi, Luna se haath peele honge,
Mandap ke design BD-I mein banenge.

Cards ke to A1 pe plot nikaalenge,
Baki ko pdf gtalk se bhejenge.

Architects ki partnership hai, CoA ki razamandi hai,
Ye rishta aisa jo Fevicol se bhi mazboot hai!

Sajega Department, bajenge Shehnaai,
Himani aur Aashish ko bohot bohot badhai!!

Thursday, January 16, 2014

ख़ासियत और आमदारी

कभी जो आम था पंछी , बनेगा ख़ास वो इक दिन
की बेआवाज़ था जो कल, करेगा आवाज़ वो इक दिन
ये कैसा खेल पसरा ख़ासियत और आमदारी का
कि नख कटवा लिए उसने, वो भी बाज़ था इक दिन.

साल नया

 इक साल गया इक उम्र लिए
 इक हाल है जो ना बदला
 इक शाम आई इक जाम लिए
 इक रात गयी क्यों पगला 
 
 

पैगामों की मौत

पैगामों की मौत
होते देखी है क्या तुमने
वो, जो यादो के लिफाफो में
तुमको मैने भेजे थे
पच्चीस दुवाओं की उनपे
टिकट भी लगाई थी
मुझपे वापिस आए नही वो
ना ही  तुम्हारा  जवाब आया

जाने कहाँ चले गये
कही ठंड मे मर ना गये हों

वो जो हममें तुममे क़रार था

कल, रेडियो पे आ रही
गुलाम अली की एक पुरानी ग़ज़ल क्या सुन ली.
दिल के तार पूर्ज़े हिल गये.
जैसे फ़ेसबुक के लाइक्स के बीच
किसी ने टेलीग्राम भेज तारीफ की हो.
जैसे मोबाइल कमेरे से कोई,
फोटो प्रिंट हो के निकली हो.
जैसे बारिस्ता के सोफे पे बैठ,
तपरी की कटिंग चायपी ली हो.
‘वो जो हममें तुममे क़रार था
तुम्हे याद हो के ना याद हो’
कभी जीवन इतना आसान था
अब याद हो भी तो कैसे हो.

दिल का खजाना

तब सोचते थे, कि तब सोचेंगे, जब सोच हासिल करने लायक होंगे
अब सोचते है, काश तब सोच लेते, अब इतना ना सोचना पड़ता.
ना जाने क्यू तब, खोजते थे हर उस चीज़ को जो पास नही थी अपने,
तब खोज लेते गर दिल का खजाना, आज उसका अवशेष ना खोजना पड़ता.

य राम, या रहीम


ज़मानो से हूँ होशदार
नही बर्दास्त होता अब,
मुझे होश की दवा नही
बेहोशी का हकीम दिला दो
की मुझको प्यार ना ज़्यादा
ना कम है बुतपरस्ती से
जो करदे ख़त्म ये दंगे
य राम, या रहीम दिला दो