कल, रेडियो पे आ रही
गुलाम अली की एक पुरानी ग़ज़ल क्या सुन ली.
दिल के तार पूर्ज़े हिल गये.
जैसे फ़ेसबुक के लाइक्स के बीच
किसी ने टेलीग्राम भेज तारीफ की हो.
जैसे मोबाइल कमेरे से कोई,
फोटो प्रिंट हो के निकली हो.
जैसे बारिस्ता के सोफे पे बैठ,
तपरी की कटिंग चायपी ली हो.
‘वो जो हममें तुममे क़रार था
तुम्हे याद हो के ना याद हो’
कभी जीवन इतना आसान था
अब याद हो भी तो कैसे हो.
गुलाम अली की एक पुरानी ग़ज़ल क्या सुन ली.
दिल के तार पूर्ज़े हिल गये.
जैसे फ़ेसबुक के लाइक्स के बीच
किसी ने टेलीग्राम भेज तारीफ की हो.
जैसे मोबाइल कमेरे से कोई,
फोटो प्रिंट हो के निकली हो.
जैसे बारिस्ता के सोफे पे बैठ,
तपरी की कटिंग चायपी ली हो.
‘वो जो हममें तुममे क़रार था
तुम्हे याद हो के ना याद हो’
कभी जीवन इतना आसान था
अब याद हो भी तो कैसे हो.
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