Thursday, January 16, 2014

पैगामों की मौत

पैगामों की मौत
होते देखी है क्या तुमने
वो, जो यादो के लिफाफो में
तुमको मैने भेजे थे
पच्चीस दुवाओं की उनपे
टिकट भी लगाई थी
मुझपे वापिस आए नही वो
ना ही  तुम्हारा  जवाब आया

जाने कहाँ चले गये
कही ठंड मे मर ना गये हों

वो जो हममें तुममे क़रार था

कल, रेडियो पे आ रही
गुलाम अली की एक पुरानी ग़ज़ल क्या सुन ली.
दिल के तार पूर्ज़े हिल गये.
जैसे फ़ेसबुक के लाइक्स के बीच
किसी ने टेलीग्राम भेज तारीफ की हो.
जैसे मोबाइल कमेरे से कोई,
फोटो प्रिंट हो के निकली हो.
जैसे बारिस्ता के सोफे पे बैठ,
तपरी की कटिंग चायपी ली हो.
‘वो जो हममें तुममे क़रार था
तुम्हे याद हो के ना याद हो’
कभी जीवन इतना आसान था
अब याद हो भी तो कैसे हो.

दिल का खजाना

तब सोचते थे, कि तब सोचेंगे, जब सोच हासिल करने लायक होंगे
अब सोचते है, काश तब सोच लेते, अब इतना ना सोचना पड़ता.
ना जाने क्यू तब, खोजते थे हर उस चीज़ को जो पास नही थी अपने,
तब खोज लेते गर दिल का खजाना, आज उसका अवशेष ना खोजना पड़ता.

य राम, या रहीम


ज़मानो से हूँ होशदार
नही बर्दास्त होता अब,
मुझे होश की दवा नही
बेहोशी का हकीम दिला दो
की मुझको प्यार ना ज़्यादा
ना कम है बुतपरस्ती से
जो करदे ख़त्म ये दंगे
य राम, या रहीम दिला दो
 

Tuesday, January 24, 2012

Song of Us


A tribute to college days - a song which we prepared in  in IIT- Song of US
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इक कोशिश , आशा है
जी लेंगे जीभर के हम

नही महज यह गीत जो हम गुनगुना रहे
मिल गये हैं संग वो जो वो दिल हैं गा रहे
ये साथ ना छोड़ेंगे हम
आए भले कितने सितम

सपनो में देखा है जैसा
हो अपना जहाँ एक वैसा
जी लें जीभर इस जीवन को
सोचा है हमने ऐसा
थामे रहें ये हाथ हम
आए भले कितने सितम

दिन शायद ऐसे भी आयें
खुद को टूटा हुआ पाए
याद करेंगे शायद जो यह पल
आँखे नाम हो जाए
याद रहे अपनी कसम
थे साथ हैं, रहेंगे हम

Wednesday, January 18, 2012

बेतमन्ना

तुमसे मिलना है, ए ज़िंदगी
ज़रा फ़ुर्सत तो पहचानो
कभी इस बेतमन्ना की
तमन्ना को भी तो जानो

तुम्हे सोचा किया करना
तुम्हारी राह यूँ तकना
तुम्हे ही ढूँढते रहना
हमारा काम है अब तो

की हम अब हैं ही तुमसे बस
ना हमको यूँ जुदा मानो

Monday, January 16, 2012

कोई इक दिन हज़ारो में

कोई इक दिन हज़ारो में
बना जाता है बंजारा
भटकते चौक चौबारे
मंदिर, चर्च गुरद्वारा

कोई इक दिन हज़ारो में
बना जाता है नाकारा
ना कोई "टू डू लिस्ट"
नाही मैं काम का मारा

कोई इक दिन हज़ारो में
बना जाता है शायर भी
की यादें उनकी आती हैं
बनाती दिल को आवारा

आज ना जाने क्या हुआ
ये तीनो मिल गये हैं दिन
बना छोड़ा है मुझको इक
शायर बंजारा , नाकारा

Saturday, January 14, 2012

जिन दीनो

जिन दीनो कोई नही था
इन यादों के गाँव में
अकेला ही शीतल होता था
यहाँ की ठंडी छाँव में

खालीपन तो था कुछ किंतु
खुश तो उसमें भी था मैं
आकर तुमने साथ दिया तो
कहाँ रहा फिर तन्हा मैं

उस पल सचेत किया दिमाग़ ने
शायद आदत से हो मजबूर
की पास आकर चले गये तो
क्या होगा, इक दिन तुम दूर

दुनिया देख रखी थी उसनें
दिन के बाद रात देखी थी
लिफाफो में बंद होते उसने
यादो की बारात देखी थी

Sunday, January 8, 2012

कहाँ गए


साज़ यहाँ, आवाज़ यहाँ
पर सुनने वाले कहाँ गए
दिल रह रह कर पूछ रहा
हमें पूछने वाले कहाँ गए

जो याद कभी कर लेते थे
वो भूलनेवाले कहाँ गए
संग संग ख्वाबो के झूलो में
वो झूलनेवाले कहाँ गए

सपनो की साथ वो चादर
झीनी बुननेवाले कहाँ गए
आकाश में अंतिम यादों के
वो उड़नेवाले कहाँ गए

दिल रह रह कर पूछ रहा
हमें पूछने वाले कहाँ गए

दिल की बातें


दिल की बातें जाने दो
क्या देना पागल को तूल
सरलता से बाकी बातों को
जैसे जाते हो, जाओ भूल